सामान्य स्थिति होना बंगाल में एक असामान्य बात है। ममता के बीते पांच साल के शासन के दौरान और अबके आगामी पांच साल के शासन में एक चीज़ सामान्य है – हिंसा। अगर ममता के नारे ‘खेला होबे’ का असल मतलब ढूँढने की कोशिश की जाए तो निश्चित तौर पर उसे ख़ूनी खेला होबे कहा जाएगा। विधान सभा चुनावों से पहले और चुनावों के बाद TMC के गुंडों द्वारा खेला गया हिंसा, बलात्कार, आगजनी और मौत का नंगा नाच सबको याद है। केंद्र सरकार और न्यायपालिका ममता के गुंडातंत्र के आगे निरीह दिखाई दिए। पिछले महीने ही बीरभूम में हुई हिंसा ममता के कुशाशन की एक और नज़ीर है।

हाल ही में बंगाल में एक और ख़ौफ़नाक मामला सामने आया है। नदिया ज़िले में एक नाबालिग बच्ची की सामूहिक दुष्कर्म के बाद मौत हो गई। घटना का आरोपी TMC नेता का बेटा बताया जा रहा है। मामला जब तूल पकड़ा तो ममता बनर्जी का एक स्टेटमेंट आया। सबको लगा ममता रेप जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उचित प्रतिक्रिया देंगी। लेकिन ममता द्वारा पीड़िता के चरित्र पर ही सवाल खड़े किये जाने पर न्याय की बची-खुची उम्मीद भी टूट गई।

एक मुख्यमंत्री और उससे भी पहले एक महिला होने के नाते ममता बनर्जी से इस मुद्दे पर संवेदनशीलता अपेक्षित थी। लेकिन जब सत्ता का नशा दिमाग पर पूरी तरह से चढ़ जाए और उस पर जब अपनी ही पार्टी के नेता का बेटा मामले में मुख्य आरोपी हो तो अपने बचाव में स्वाभाविक है ऐसी नृशंस घटनाओं पर इस तरह की नीच प्रतिक्रिया। भले ही इसके लिए दुष्कर्म की शिकार उस मृत नाबालिग बच्ची का चरित्र हनन ही क्यों न करना पड़े। वैसे भी, राजनीती में कौनसी नैतिकता की परवाह की जाती है।

बंगाल में कुछ नहीं बदला। लोग वही हैं, सरकार वही है, जघन्य अपराधों का सिलसिला भी वैसा ही है। ममता का खेला होबे का नारा अब बंगाल में अक्षरश: पूरा होता दिख रहा है।