ड्रग्स केस में शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की गिरफ़्तारी ने बॉलीवुड की गन्दी काली दुनिया को एक बार फिर उजागर किया है। सुशांत सिंह राजपूत की हत्या के बाद से जो परिस्थितियां बनी, उसने सीबीआई जांच के साथ-साथ नारकोटिक्स ब्यूरो की भी एंट्री करवा दी। पिछले एक साल से सुशांत की हत्या के मामले में हो रही सीबीआई जांच का तो कुछ अता-पता नहीं, लेकिन नारकोटिक्स ब्यूरो ने तभी से काफ़ी सक्रियता बनाई हुई है।

एक के बाद एक ड्रग पेड्ड्लर्स की धरपकड़ हुई, जिनके साथ हुई पूछताछ ने फिल्म इंडस्ट्री की कई बड़ी मछलियों के राज़ फ़ाश कर दिए। ब्यूरो द्वारा जारी समन ने उन सभी नामी-गिरामी हस्तियों की आइडियल इमेज को ध्वस्त कर दिया। आलम ये है कि कभी फ़िल्मी दुनिया के इन चमचमाते सितारों को अपने सर पर बैठाने वाली आम जनता आज इन्हें हेय दृष्टि से देखती है। 90 या उससे पहले के दशक की बात होती तो इस तरह की घटनाएं पैसे और रसूख के दम पर दबा दी जाती। लेकिन सोशल मीडिया के ज़माने में अब ऐसा होना थोड़ा मुश्किल है।

सोशल मीडिया का एडवांटेज और डिसएडवांटेज ये है कि कोई ख़बर चाहे सही हो या ग़लत, फैलती एकदम जंगल की आग की तरह है। लेकिन कोई कितना भी भ्रमित करने का प्रयास करे, सच्चाई सामने आ ही जाती है। इसके लिए वो सभी सोशल मीडिया क्रूसेडर्स बधाई के पात्र हैं, जो हर तरह के ख़तरे को नज़रअंदाज़ कर घटनाओं का सटीक विश्लेषण कर उन्हें जनता के समक्ष प्रस्तुत करने के काम में लगे हुए हैं। इसके अलावा, दशकों से चले आ रहे बॉलीवुड के हिन्दूफ़ोबिक कॉन्टेंट से जनता को जागरूक कराने में इनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए, वो कम है। इनके इस अमूल्य योगदान ने आज हिन्दू समाज में एक नई चेतना और एकता का संचार किया है।

अब तय ये करना है कि हमें किन्हें अपना आदर्श बनाना है? चरस, गांजे, कोकीन, एलएसडी, आदि की खुमारी में रहने वाले ‘उड़ते बॉलीवुड’ के इन ‘सदाबहार चरसी’ भांड जोकरों को या ज़मीनी सतह पर संघर्ष कर ऊंचा मुकाम पाने वाले लोगों को। फ़ैसला आप पर है।